Ghazal collection

इक तो मौसम सर्द है और फिर गले में दर्द है

और फिर ऊपर से मेरा तन-बदन भी ज़र्द है


आँख पीली पड़ गयी हैं रात भर जगते हुए

रो नहीं सकता कि मेरी ज़िंदगी पुर-दर्द है


फूट के रोता नहीं है देखकर वीरानियाँ

क्या कहूँ कि दिल मेरा है या कोई नामर्द है


घर में घुसता हूँ तो लगता है कि रेगिस्तान है

मेरे इक कमरे में सारे शहर भर की गर्द है


ऐसे कुछ तोहफ़े मिले मेरी मुहब्बत में मुझे

दर्द अपने दे गया है मेरा जो हमदर्द है


मर चुका हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कभी

सोच लो साजन मेरा कि किस क़दर बे-दर्द है


दो घड़ी बातें करो तो नोंचकर खा जायेगा

आदमी लगता नहीं लगता है कि सरदर्द है


पूछते हो क्यों मुझे है ज़िंदगी में क्या नया

और क्या है ज़िंदगी में तू है तेरा दर्द है

Nakul Kumar
96

इक तो मौसम सर्द है और फिर गले में दर्द है

और फिर ऊपर से मेरा तन-बदन भी ज़र्द है


आँख पीली पड़ गयी हैं रात भर जगते हुए

रो नहीं सकता कि मेरी ज़िंदगी पुर-दर्द है


फूट के रोता नहीं है देखकर वीरानियाँ

क्या कहूँ कि दिल मेरा है या कोई नामर्द है


घर में घुसता हूँ तो लगता है कि रेगिस्तान है

मेरे इक कमरे में सारे शहर भर की गर्द है


ऐसे कुछ तोहफ़े मिले मेरी मुहब्बत में मुझे

दर्द अपने दे गया है मेरा जो हमदर्द है


मर चुका हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कभी

सोच लो साजन मेरा कि किस क़दर बे-दर्द है


दो घड़ी बातें करो तो नोंचकर खा जायेगा

आदमी लगता नहीं लगता है कि सरदर्द है


पूछते हो क्यों मुझे है ज़िंदगी में क्या नया

और क्या है ज़िंदगी में तू है तेरा दर्द है

-Nakul Kumar
Sheristan

पेट में दाना नहीं उपवास लेकर क्या करें

मर चुके प्यासे परिंदे प्यास लेकर क्या करें


सर्वभौमिक सत्य है कि मृत्यु का आना है तय 

मछलियाँ बगलों से फिर विश्वास लेकर क्या करें


ज़िंदगी खा जायेगी सरकार की माफ़िक हमें

फिर ज़हर की गोली या सल्फास लेकर क्या करें


पेट भरने के लिये हम दूर हैं बच्चों से अब

और फिर इससे अलग सन्यास लेकर क्या करें


सब के सब हैं जा चुके तुम भी चले ही जाओगे

फिर भी हम तुमसे कोई अब आस लेकर क्या करें


हम कि जो भूगोल से बाहर रहे सदियों तलक

फिर तुम्हारा गौरवी इतिहास लेकर क्या करें


अब तलक उपहास का हम केंद्र ही बनकर रहे

फिर तनिक मिल भी गया तो हास लेकर क्या करें

-Nakul Kumar
Sheristan

नसें जो हाथ की काटी गयी हैं

ये सब साँसे कहीं बाटी गयी हैं


जिधर भी ख़ून के क़तरे गिरें हैं

ज़मीनें सब की सब चाटी गयी हैं


मिरे घावों की जो गहराइयाँ हैं

बड़ी मुश्किल से सब पाटी गयी हैं


लहू मेरा नदी बनके बहा है

कई घाटी भी यूँ आटी गयी हैं


मिरे ही संग जली हैं आज ये सब

जो लकड़ी भी कभी काटी गयी हैं


मिरे भीतर मरा है और भी कुछ

मिरी माटी में कुछ माटी गयी हैं

-Nakul Kumar
Sheristan

आँख से गिरता आँसू ज़ियादा खारा होता है

बेघर होकर मरता है बेचारा होता है


मीठी नदियाँ खारे सागर तक क्यों जाती हैं

क्या इनको भी दर्द बहुत ही प्यारा होता है


तारों को हल्के में लेकर इतराता है आफ़ताब

भूल गया कि हर इक सूरज तारा होता है


वक़्त से जिसकी आनाकानी चलती रहती है

उसका दुश्मन तो फिर जग ये सारा होता है


ख़ुद जलकर रौशन करता है अपनी इक दुनिया

वो कहते हैं जुगनू तो आवारा होता है


जिन लोगों को ग़म के बादल ठंडे लगते हैं

उनका अपना एक अलग सय्यारा होता है


एक मुहब्बत से तंग आ तौबा कर जाते हैं

उन लोगों के संग ऐसा दोबारा होता है


ख़ुशियों का तो आना जाना लगा रहेगा पर

ग़म का दिल में रह जाना हमवारा होता है


जाने कौन घड़ी में ज़ख़्म सुलगने लग जायें

वक़्त सभी के दर्दों का हरकारा होता है


अपने अंदर से आकर जो बाहर रहता है

किसी के भी दिल में रह ले बंजारा होता है


बो देता है ख़्वाहिश फिर रोता है सातों दिन

अपना मन ही हर ग़म का गहवारा होता है

Nakul Kumar
92

आँख से गिरता आँसू ज़ियादा खारा होता है

बेघर होकर मरता है बेचारा होता है


मीठी नदियाँ खारे सागर तक क्यों जाती हैं

क्या इनको भी दर्द बहुत ही प्यारा होता है


तारों को हल्के में लेकर इतराता है आफ़ताब

भूल गया कि हर इक सूरज तारा होता है


वक़्त से जिसकी आनाकानी चलती रहती है

उसका दुश्मन तो फिर जग ये सारा होता है


ख़ुद जलकर रौशन करता है अपनी इक दुनिया

वो कहते हैं जुगनू तो आवारा होता है


जिन लोगों को ग़म के बादल ठंडे लगते हैं

उनका अपना एक अलग सय्यारा होता है


एक मुहब्बत से तंग आ तौबा कर जाते हैं

उन लोगों के संग ऐसा दोबारा होता है


ख़ुशियों का तो आना जाना लगा रहेगा पर

ग़म का दिल में रह जाना हमवारा होता है


जाने कौन घड़ी में ज़ख़्म सुलगने लग जायें

वक़्त सभी के दर्दों का हरकारा होता है


अपने अंदर से आकर जो बाहर रहता है

किसी के भी दिल में रह ले बंजारा होता है


बो देता है ख़्वाहिश फिर रोता है सातों दिन

अपना मन ही हर ग़म का गहवारा होता है

-Nakul Kumar
Sheristan

कभी कोई पड़ जाये हम से काम तुझे

जाने जाँ का दे देंगे हम नाम तुझे


तेरी पायल कहती है झनकार तुझे

तेरे झुमके कहते हैं आराम तुझे


सुबह तेरे दर्शन करती है सुबह सुबह

शाम बेचारी तकती है हर शाम तुझे


धूप ये सारी ठंडी होकर बह जाये

जेठ दुपहरे लग जाये जब घाम तुझे

-Nakul Kumar
Sheristan

बैरी चाँद ने चाँद कहा ऐ जान तुझे

जाने पागल क्या बैठा है मान तुझे


मैंने पूछा क्या देखा क्या पाया है

तो बोला अपने दिल का अरमान तुझे


सारे फूलों ने मिलजुलकर सोचा है

थोड़ी ख़ुश्बू मिल जाये कर ध्यान तुझे


गाल तेरे रौशन करते हैं सब रातें

सूरज अब तो कहता है बेईमान तुझे


तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में लगता है

बादल मान चुके हैं अपनी शान तुझे


तेरी आँखें चमक निराली रखती हैं

सब तारे ही कहते हैं आसमान तुझे


होंठ तेरे गुलकंद की माफ़िक मीठे हैं

सब पत्तों ने मान लिया है पान तुझे

-Nakul Kumar
Sheristan

क्या कहूँ, कैसे कहूँ, बेहाल हूँ इस हाल में

बेसुधी में गुम हूँ तेरी यादों के जंजाल में


लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही

रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में


तेरे दिल में घर किया तो ये लगा मुझको अभी

मेरा तो घर हो गया है काल के ही गाल में


खींच ली है खाल सब ख़ुशियों के ही बिकवाल ने

कौन ढूँढ़ेगा मुझे मेरे ही इस कंकाल में


तू नहीं आया कि अब है साल आने को नया

फिर अधूरा रह गया हूँ इस गुजरती साल में


लौट आया हूँ समंदर से इसी उम्मीद में

कोई तो मछली मिले ठहरे हुए इस ताल में


जा रही हो छोड़कर मुझको जहाँ आऊँगा मैं

चाहती है इक हसीं मुझको तिरे ससुराल में


क्या करूँ, क्या दर्द अपने बाँट लूँ दुनिया से मैं

घोल दूँगा अपने सारे अश्क इस पाताल में


मुझको पूरा खा गया है दिल के दरवाज़े तलक

भेड़िया फिर मिल गया है भेड़ की ही खाल में

Nakul Kumar
87

क्या कहूँ, कैसे कहूँ, बेहाल हूँ इस हाल में

बेसुधी में गुम हूँ तेरी यादों के जंजाल में


लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही

रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में


तेरे दिल में घर किया तो ये लगा मुझको अभी

मेरा तो घर हो गया है काल के ही गाल में


खींच ली है खाल सब ख़ुशियों के ही बिकवाल ने

कौन ढूँढ़ेगा मुझे मेरे ही इस कंकाल में


तू नहीं आया कि अब है साल आने को नया

फिर अधूरा रह गया हूँ इस गुजरती साल में


लौट आया हूँ समंदर से इसी उम्मीद में

कोई तो मछली मिले ठहरे हुए इस ताल में


जा रही हो छोड़कर मुझको जहाँ आऊँगा मैं

चाहती है इक हसीं मुझको तिरे ससुराल में


क्या करूँ, क्या दर्द अपने बाँट लूँ दुनिया से मैं

घोल दूँगा अपने सारे अश्क इस पाताल में


मुझको पूरा खा गया है दिल के दरवाज़े तलक

भेड़िया फिर मिल गया है भेड़ की ही खाल में

-Nakul Kumar
Sheristan

लड़खड़ाती है क़लम, रंगीनियाँ ही क्यों लिखूँ 

लू से जलता है बदन, पुरवाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


दिख रही हों जब मुझे हैवानियत की बस्तियाँ

तो इन्हें महबूब की शैतानियाँ ही क्यों लिखूँ 


देख लूँ मैं जब कभी बूढ़ी भिखारन को कहीं

क्यों लिखूँ ग़ज़लों में परियाँ, रानियाँ ही क्यों लिखूँ 


फूल से बच्चों के चेहरे भूख से बेरंग हों

तो बता ऐ दिल मिरे फिर तितलियाँ ही क्यों लिखूँ 


माँ तिरे चेहरे पे जब से झुर्रियाँ दिखने लगीं 

और भी लिखना है कुछ रानाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


क्यों लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग्मे बहुत

प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


लिख तो सकता हूँ बहुत सी ख़ुशनुमा ऊँचाइयाँ

फिर ग़मों की ही बहुत गहराइयाँ ही क्यों लिखूँ 


क्यों लिखूँ दोनों तरफ़, दोनों तरफ़ की क्यों लिखूँ 

रौशनी लिख दूँ मगर परछाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


जंग के मैदान में ये ख़ून या सिन्दूर है

शोर जब भरपूर है, शहनाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


पेट की ख़ातिर जो हरदम तोड़ता हो तन बदन

चैन से बैठा नहीं, अंगड़ाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


मैं लिखूँ दुनिया के हर इक आदमी की ज़िंदगी

मौत की आमद या फिर बीमारियाँ ही क्यों लिखूँ 


ये नए लड़के जो सोलह साल के भी हैं नहीं

इनकी ये मदमस्तियाँ-नादानियाँ ही क्यों लिखूँ 


ज़िंदगी अपनी अभी तो ज़िंदगी से है जुदा

अब मगर वीरानियाँ-बर्बादियाँ ही क्यों लिखूँ 


हाँ, मिरे बेटे लिखूँगा मैं तुझे मेले बहुत

मैं अकेला ही जिया, तन्हाइयाँ ही क्यों लिखूँ

Nakul Kumar
87

लड़खड़ाती है क़लम, रंगीनियाँ ही क्यों लिखूँ 

लू से जलता है बदन, पुरवाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


दिख रही हों जब मुझे हैवानियत की बस्तियाँ

तो इन्हें महबूब की शैतानियाँ ही क्यों लिखूँ 


देख लूँ मैं जब कभी बूढ़ी भिखारन को कहीं

क्यों लिखूँ ग़ज़लों में परियाँ, रानियाँ ही क्यों लिखूँ 


फूल से बच्चों के चेहरे भूख से बेरंग हों

तो बता ऐ दिल मिरे फिर तितलियाँ ही क्यों लिखूँ 


माँ तिरे चेहरे पे जब से झुर्रियाँ दिखने लगीं 

और भी लिखना है कुछ रानाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


क्यों लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग्मे बहुत

प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


लिख तो सकता हूँ बहुत सी ख़ुशनुमा ऊँचाइयाँ

फिर ग़मों की ही बहुत गहराइयाँ ही क्यों लिखूँ 


क्यों लिखूँ दोनों तरफ़, दोनों तरफ़ की क्यों लिखूँ 

रौशनी लिख दूँ मगर परछाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


जंग के मैदान में ये ख़ून या सिन्दूर है

शोर जब भरपूर है, शहनाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


पेट की ख़ातिर जो हरदम तोड़ता हो तन बदन

चैन से बैठा नहीं, अंगड़ाइयाँ ही क्यों लिखूँ 


मैं लिखूँ दुनिया के हर इक आदमी की ज़िंदगी

मौत की आमद या फिर बीमारियाँ ही क्यों लिखूँ 


ये नए लड़के जो सोलह साल के भी हैं नहीं

इनकी ये मदमस्तियाँ-नादानियाँ ही क्यों लिखूँ 


ज़िंदगी अपनी अभी तो ज़िंदगी से है जुदा

अब मगर वीरानियाँ-बर्बादियाँ ही क्यों लिखूँ 


हाँ, मिरे बेटे लिखूँगा मैं तुझे मेले बहुत

मैं अकेला ही जिया, तन्हाइयाँ ही क्यों लिखूँ

-Nakul Kumar
Sheristan

ताकते हैं रोटियाँ आँखों में लेकर बारिशें

जैसे कि रोटी के आगे मर गयी हों ख़्वाहिशें

 

भूख से बेहाल हैं और पहले से बेज़ार हैं

उसपे भी इनको चबाने की हुई हैं कोशिशें

 

इनका हक़ देदो इन्हें रोटी हों या फिर चीथड़े

और ये इससे भी बढ़कर क्या करें फ़रमाइशें

 

मुफ़्त राशन बाँटकर के मारे हैं मजदूर सब

करती है सरकार भी कितनी गिरी अज़माइशें

 

कल तलक जो काम की उम्मीद में था आज वो

हार कर बारूद पर बैठा है लेकर माचिसें


-Nakul Kumar
Sheristan

मुझे पानी जो अब लाकर दिया है

किसी प्यासे के घर मातम हुआ है


तू जिससे रौशनी पाता है दिन में

किसी के घर का ये बुझता दिया है


मुझे आदत सी है अब तो तपन की

तभी सूरज पे मैंने घर लिया है


मुझे बरसों से कोई भूख सी है

कि मैंने ख़ुद को ही अब खा लिया है


सभी के जिस्म पीले पड़ गये हैं

लहू मेरा यहाँ जिस ने पिया है


मैं रुकता हूँ सदा शमशान जाकर

मिरे अंदर कोई मरकर जिया है


मैं ख़ुद ही दांव पे हूँ अपनी ख़ातिर

ये मेरी ज़िंदगी है या जुआ है


मिरे जीने की आशा बिन तुम्हारे

दुआ के संग में कोई बद्दुआ है


मुहब्बत ख़ुदकुशी करने चली है

मिरे दिल में कोई गहरा कुआ है


किसी के इश्क़ में मारा गया हूँ

तिरे धोखे में ये धोखा हुआ है

-Nakul Kumar
Sheristan