
इक तो मौसम सर्द है और फिर गले में दर्द है
और फिर ऊपर से मेरा तन-बदन भी ज़र्द है
आँख पीली पड़ गयी हैं रात भर जगते हुए
रो नहीं सकता कि मेरी ज़िंदगी पुर-दर्द है
फूट के रोता नहीं है देखकर वीरानियाँ
क्या कहूँ कि दिल मेरा है या कोई नामर्द है
घर में घुसता हूँ तो लगता है कि रेगिस्तान है
मेरे इक कमरे में सारे शहर भर की गर्द है
ऐसे कुछ तोहफ़े मिले मेरी मुहब्बत में मुझे
दर्द अपने दे गया है मेरा जो हमदर्द है
मर चुका हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कभी
सोच लो साजन मेरा कि किस क़दर बे-दर्द है
दो घड़ी बातें करो तो नोंचकर खा जायेगा
आदमी लगता नहीं लगता है कि सरदर्द है
पूछते हो क्यों मुझे है ज़िंदगी में क्या नया
और क्या है ज़िंदगी में तू है तेरा दर्द है
इक तो मौसम सर्द है और फिर गले में दर्द है
और फिर ऊपर से मेरा तन-बदन भी ज़र्द है
आँख पीली पड़ गयी हैं रात भर जगते हुए
रो नहीं सकता कि मेरी ज़िंदगी पुर-दर्द है
फूट के रोता नहीं है देखकर वीरानियाँ
क्या कहूँ कि दिल मेरा है या कोई नामर्द है
घर में घुसता हूँ तो लगता है कि रेगिस्तान है
मेरे इक कमरे में सारे शहर भर की गर्द है
ऐसे कुछ तोहफ़े मिले मेरी मुहब्बत में मुझे
दर्द अपने दे गया है मेरा जो हमदर्द है
मर चुका हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कभी
सोच लो साजन मेरा कि किस क़दर बे-दर्द है
दो घड़ी बातें करो तो नोंचकर खा जायेगा
आदमी लगता नहीं लगता है कि सरदर्द है
पूछते हो क्यों मुझे है ज़िंदगी में क्या नया
और क्या है ज़िंदगी में तू है तेरा दर्द है


पेट में दाना नहीं उपवास लेकर क्या करें
मर चुके प्यासे परिंदे प्यास लेकर क्या करें
सर्वभौमिक सत्य है कि मृत्यु का आना है तय
मछलियाँ बगलों से फिर विश्वास लेकर क्या करें
ज़िंदगी खा जायेगी सरकार की माफ़िक हमें
फिर ज़हर की गोली या सल्फास लेकर क्या करें
पेट भरने के लिये हम दूर हैं बच्चों से अब
और फिर इससे अलग सन्यास लेकर क्या करें
सब के सब हैं जा चुके तुम भी चले ही जाओगे
फिर भी हम तुमसे कोई अब आस लेकर क्या करें
हम कि जो भूगोल से बाहर रहे सदियों तलक
फिर तुम्हारा गौरवी इतिहास लेकर क्या करें
अब तलक उपहास का हम केंद्र ही बनकर रहे
फिर तनिक मिल भी गया तो हास लेकर क्या करें
पेट में दाना नहीं उपवास लेकर क्या करें
मर चुके प्यासे परिंदे प्यास लेकर क्या करें
सर्वभौमिक सत्य है कि मृत्यु का आना है तय
मछलियाँ बगलों से फिर विश्वास लेकर क्या करें
ज़िंदगी खा जायेगी सरकार की माफ़िक हमें
फिर ज़हर की गोली या सल्फास लेकर क्या करें
पेट भरने के लिये हम दूर हैं बच्चों से अब
और फिर इससे अलग सन्यास लेकर क्या करें
सब के सब हैं जा चुके तुम भी चले ही जाओगे
फिर भी हम तुमसे कोई अब आस लेकर क्या करें
हम कि जो भूगोल से बाहर रहे सदियों तलक
फिर तुम्हारा गौरवी इतिहास लेकर क्या करें
अब तलक उपहास का हम केंद्र ही बनकर रहे
फिर तनिक मिल भी गया तो हास लेकर क्या करें


नसें जो हाथ की काटी गयी हैं
ये सब साँसे कहीं बाटी गयी हैं
जिधर भी ख़ून के क़तरे गिरें हैं
ज़मीनें सब की सब चाटी गयी हैं
मिरे घावों की जो गहराइयाँ हैं
बड़ी मुश्किल से सब पाटी गयी हैं
लहू मेरा नदी बनके बहा है
कई घाटी भी यूँ आटी गयी हैं
मिरे ही संग जली हैं आज ये सब
जो लकड़ी भी कभी काटी गयी हैं
मिरे भीतर मरा है और भी कुछ
मिरी माटी में कुछ माटी गयी हैं
नसें जो हाथ की काटी गयी हैं
ये सब साँसे कहीं बाटी गयी हैं
जिधर भी ख़ून के क़तरे गिरें हैं
ज़मीनें सब की सब चाटी गयी हैं
मिरे घावों की जो गहराइयाँ हैं
बड़ी मुश्किल से सब पाटी गयी हैं
लहू मेरा नदी बनके बहा है
कई घाटी भी यूँ आटी गयी हैं
मिरे ही संग जली हैं आज ये सब
जो लकड़ी भी कभी काटी गयी हैं
मिरे भीतर मरा है और भी कुछ
मिरी माटी में कुछ माटी गयी हैं


आँख से गिरता आँसू ज़ियादा खारा होता है
बेघर होकर मरता है बेचारा होता है
मीठी नदियाँ खारे सागर तक क्यों जाती हैं
क्या इनको भी दर्द बहुत ही प्यारा होता है
तारों को हल्के में लेकर इतराता है आफ़ताब
भूल गया कि हर इक सूरज तारा होता है
वक़्त से जिसकी आनाकानी चलती रहती है
उसका दुश्मन तो फिर जग ये सारा होता है
ख़ुद जलकर रौशन करता है अपनी इक दुनिया
वो कहते हैं जुगनू तो आवारा होता है
जिन लोगों को ग़म के बादल ठंडे लगते हैं
उनका अपना एक अलग सय्यारा होता है
एक मुहब्बत से तंग आ तौबा कर जाते हैं
उन लोगों के संग ऐसा दोबारा होता है
ख़ुशियों का तो आना जाना लगा रहेगा पर
ग़म का दिल में रह जाना हमवारा होता है
जाने कौन घड़ी में ज़ख़्म सुलगने लग जायें
वक़्त सभी के दर्दों का हरकारा होता है
अपने अंदर से आकर जो बाहर रहता है
किसी के भी दिल में रह ले बंजारा होता है
बो देता है ख़्वाहिश फिर रोता है सातों दिन
अपना मन ही हर ग़म का गहवारा होता है
आँख से गिरता आँसू ज़ियादा खारा होता है
बेघर होकर मरता है बेचारा होता है
मीठी नदियाँ खारे सागर तक क्यों जाती हैं
क्या इनको भी दर्द बहुत ही प्यारा होता है
तारों को हल्के में लेकर इतराता है आफ़ताब
भूल गया कि हर इक सूरज तारा होता है
वक़्त से जिसकी आनाकानी चलती रहती है
उसका दुश्मन तो फिर जग ये सारा होता है
ख़ुद जलकर रौशन करता है अपनी इक दुनिया
वो कहते हैं जुगनू तो आवारा होता है
जिन लोगों को ग़म के बादल ठंडे लगते हैं
उनका अपना एक अलग सय्यारा होता है
एक मुहब्बत से तंग आ तौबा कर जाते हैं
उन लोगों के संग ऐसा दोबारा होता है
ख़ुशियों का तो आना जाना लगा रहेगा पर
ग़म का दिल में रह जाना हमवारा होता है
जाने कौन घड़ी में ज़ख़्म सुलगने लग जायें
वक़्त सभी के दर्दों का हरकारा होता है
अपने अंदर से आकर जो बाहर रहता है
किसी के भी दिल में रह ले बंजारा होता है
बो देता है ख़्वाहिश फिर रोता है सातों दिन
अपना मन ही हर ग़म का गहवारा होता है


कभी कोई पड़ जाये हम से काम तुझे
जाने जाँ का दे देंगे हम नाम तुझे
तेरी पायल कहती है झनकार तुझे
तेरे झुमके कहते हैं आराम तुझे
सुबह तेरे दर्शन करती है सुबह सुबह
शाम बेचारी तकती है हर शाम तुझे
धूप ये सारी ठंडी होकर बह जाये
जेठ दुपहरे लग जाये जब घाम तुझे


बैरी चाँद ने चाँद कहा ऐ जान तुझे
जाने पागल क्या बैठा है मान तुझे
मैंने पूछा क्या देखा क्या पाया है
तो बोला अपने दिल का अरमान तुझे
सारे फूलों ने मिलजुलकर सोचा है
थोड़ी ख़ुश्बू मिल जाये कर ध्यान तुझे
गाल तेरे रौशन करते हैं सब रातें
सूरज अब तो कहता है बेईमान तुझे
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में लगता है
बादल मान चुके हैं अपनी शान तुझे
तेरी आँखें चमक निराली रखती हैं
सब तारे ही कहते हैं आसमान तुझे
होंठ तेरे गुलकंद की माफ़िक मीठे हैं
सब पत्तों ने मान लिया है पान तुझे
बैरी चाँद ने चाँद कहा ऐ जान तुझे
जाने पागल क्या बैठा है मान तुझे
मैंने पूछा क्या देखा क्या पाया है
तो बोला अपने दिल का अरमान तुझे
सारे फूलों ने मिलजुलकर सोचा है
थोड़ी ख़ुश्बू मिल जाये कर ध्यान तुझे
गाल तेरे रौशन करते हैं सब रातें
सूरज अब तो कहता है बेईमान तुझे
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में लगता है
बादल मान चुके हैं अपनी शान तुझे
तेरी आँखें चमक निराली रखती हैं
सब तारे ही कहते हैं आसमान तुझे
होंठ तेरे गुलकंद की माफ़िक मीठे हैं
सब पत्तों ने मान लिया है पान तुझे


क्या कहूँ, कैसे कहूँ, बेहाल हूँ इस हाल में
बेसुधी में गुम हूँ तेरी यादों के जंजाल में
लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही
रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में
तेरे दिल में घर किया तो ये लगा मुझको अभी
मेरा तो घर हो गया है काल के ही गाल में
खींच ली है खाल सब ख़ुशियों के ही बिकवाल ने
कौन ढूँढ़ेगा मुझे मेरे ही इस कंकाल में
तू नहीं आया कि अब है साल आने को नया
फिर अधूरा रह गया हूँ इस गुजरती साल में
लौट आया हूँ समंदर से इसी उम्मीद में
कोई तो मछली मिले ठहरे हुए इस ताल में
जा रही हो छोड़कर मुझको जहाँ आऊँगा मैं
चाहती है इक हसीं मुझको तिरे ससुराल में
क्या करूँ, क्या दर्द अपने बाँट लूँ दुनिया से मैं
घोल दूँगा अपने सारे अश्क इस पाताल में
मुझको पूरा खा गया है दिल के दरवाज़े तलक
भेड़िया फिर मिल गया है भेड़ की ही खाल में
क्या कहूँ, कैसे कहूँ, बेहाल हूँ इस हाल में
बेसुधी में गुम हूँ तेरी यादों के जंजाल में
लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही
रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में
तेरे दिल में घर किया तो ये लगा मुझको अभी
मेरा तो घर हो गया है काल के ही गाल में
खींच ली है खाल सब ख़ुशियों के ही बिकवाल ने
कौन ढूँढ़ेगा मुझे मेरे ही इस कंकाल में
तू नहीं आया कि अब है साल आने को नया
फिर अधूरा रह गया हूँ इस गुजरती साल में
लौट आया हूँ समंदर से इसी उम्मीद में
कोई तो मछली मिले ठहरे हुए इस ताल में
जा रही हो छोड़कर मुझको जहाँ आऊँगा मैं
चाहती है इक हसीं मुझको तिरे ससुराल में
क्या करूँ, क्या दर्द अपने बाँट लूँ दुनिया से मैं
घोल दूँगा अपने सारे अश्क इस पाताल में
मुझको पूरा खा गया है दिल के दरवाज़े तलक
भेड़िया फिर मिल गया है भेड़ की ही खाल में


लड़खड़ाती है क़लम, रंगीनियाँ ही क्यों लिखूँ
लू से जलता है बदन, पुरवाइयाँ ही क्यों लिखूँ
दिख रही हों जब मुझे हैवानियत की बस्तियाँ
तो इन्हें महबूब की शैतानियाँ ही क्यों लिखूँ
देख लूँ मैं जब कभी बूढ़ी भिखारन को कहीं
क्यों लिखूँ ग़ज़लों में परियाँ, रानियाँ ही क्यों लिखूँ
फूल से बच्चों के चेहरे भूख से बेरंग हों
तो बता ऐ दिल मिरे फिर तितलियाँ ही क्यों लिखूँ
माँ तिरे चेहरे पे जब से झुर्रियाँ दिखने लगीं
और भी लिखना है कुछ रानाइयाँ ही क्यों लिखूँ
क्यों लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग्मे बहुत
प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यों लिखूँ
लिख तो सकता हूँ बहुत सी ख़ुशनुमा ऊँचाइयाँ
फिर ग़मों की ही बहुत गहराइयाँ ही क्यों लिखूँ
क्यों लिखूँ दोनों तरफ़, दोनों तरफ़ की क्यों लिखूँ
रौशनी लिख दूँ मगर परछाइयाँ ही क्यों लिखूँ
जंग के मैदान में ये ख़ून या सिन्दूर है
शोर जब भरपूर है, शहनाइयाँ ही क्यों लिखूँ
पेट की ख़ातिर जो हरदम तोड़ता हो तन बदन
चैन से बैठा नहीं, अंगड़ाइयाँ ही क्यों लिखूँ
मैं लिखूँ दुनिया के हर इक आदमी की ज़िंदगी
मौत की आमद या फिर बीमारियाँ ही क्यों लिखूँ
ये नए लड़के जो सोलह साल के भी हैं नहीं
इनकी ये मदमस्तियाँ-नादानियाँ ही क्यों लिखूँ
ज़िंदगी अपनी अभी तो ज़िंदगी से है जुदा
अब मगर वीरानियाँ-बर्बादियाँ ही क्यों लिखूँ
हाँ, मिरे बेटे लिखूँगा मैं तुझे मेले बहुत
मैं अकेला ही जिया, तन्हाइयाँ ही क्यों लिखूँ
लड़खड़ाती है क़लम, रंगीनियाँ ही क्यों लिखूँ
लू से जलता है बदन, पुरवाइयाँ ही क्यों लिखूँ
दिख रही हों जब मुझे हैवानियत की बस्तियाँ
तो इन्हें महबूब की शैतानियाँ ही क्यों लिखूँ
देख लूँ मैं जब कभी बूढ़ी भिखारन को कहीं
क्यों लिखूँ ग़ज़लों में परियाँ, रानियाँ ही क्यों लिखूँ
फूल से बच्चों के चेहरे भूख से बेरंग हों
तो बता ऐ दिल मिरे फिर तितलियाँ ही क्यों लिखूँ
माँ तिरे चेहरे पे जब से झुर्रियाँ दिखने लगीं
और भी लिखना है कुछ रानाइयाँ ही क्यों लिखूँ
क्यों लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग्मे बहुत
प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यों लिखूँ
लिख तो सकता हूँ बहुत सी ख़ुशनुमा ऊँचाइयाँ
फिर ग़मों की ही बहुत गहराइयाँ ही क्यों लिखूँ
क्यों लिखूँ दोनों तरफ़, दोनों तरफ़ की क्यों लिखूँ
रौशनी लिख दूँ मगर परछाइयाँ ही क्यों लिखूँ
जंग के मैदान में ये ख़ून या सिन्दूर है
शोर जब भरपूर है, शहनाइयाँ ही क्यों लिखूँ
पेट की ख़ातिर जो हरदम तोड़ता हो तन बदन
चैन से बैठा नहीं, अंगड़ाइयाँ ही क्यों लिखूँ
मैं लिखूँ दुनिया के हर इक आदमी की ज़िंदगी
मौत की आमद या फिर बीमारियाँ ही क्यों लिखूँ
ये नए लड़के जो सोलह साल के भी हैं नहीं
इनकी ये मदमस्तियाँ-नादानियाँ ही क्यों लिखूँ
ज़िंदगी अपनी अभी तो ज़िंदगी से है जुदा
अब मगर वीरानियाँ-बर्बादियाँ ही क्यों लिखूँ
हाँ, मिरे बेटे लिखूँगा मैं तुझे मेले बहुत
मैं अकेला ही जिया, तन्हाइयाँ ही क्यों लिखूँ


ताकते हैं रोटियाँ आँखों में लेकर बारिशें
जैसे कि रोटी के आगे मर गयी हों ख़्वाहिशें
भूख से बेहाल हैं और पहले से बेज़ार हैं
उसपे भी इनको चबाने की हुई हैं कोशिशें
इनका हक़ देदो इन्हें रोटी हों या फिर चीथड़े
और ये इससे भी बढ़कर क्या करें फ़रमाइशें
मुफ़्त राशन बाँटकर के मारे हैं मजदूर सब
करती है सरकार भी कितनी गिरी अज़माइशें
कल तलक जो काम की उम्मीद में था आज वो
हार कर बारूद पर बैठा है लेकर माचिसें
ताकते हैं रोटियाँ आँखों में लेकर बारिशें
जैसे कि रोटी के आगे मर गयी हों ख़्वाहिशें
भूख से बेहाल हैं और पहले से बेज़ार हैं
उसपे भी इनको चबाने की हुई हैं कोशिशें
इनका हक़ देदो इन्हें रोटी हों या फिर चीथड़े
और ये इससे भी बढ़कर क्या करें फ़रमाइशें
मुफ़्त राशन बाँटकर के मारे हैं मजदूर सब
करती है सरकार भी कितनी गिरी अज़माइशें
कल तलक जो काम की उम्मीद में था आज वो
हार कर बारूद पर बैठा है लेकर माचिसें


मुझे पानी जो अब लाकर दिया है
किसी प्यासे के घर मातम हुआ है
तू जिससे रौशनी पाता है दिन में
किसी के घर का ये बुझता दिया है
मुझे आदत सी है अब तो तपन की
तभी सूरज पे मैंने घर लिया है
मुझे बरसों से कोई भूख सी है
कि मैंने ख़ुद को ही अब खा लिया है
सभी के जिस्म पीले पड़ गये हैं
लहू मेरा यहाँ जिस ने पिया है
मैं रुकता हूँ सदा शमशान जाकर
मिरे अंदर कोई मरकर जिया है
मैं ख़ुद ही दांव पे हूँ अपनी ख़ातिर
ये मेरी ज़िंदगी है या जुआ है
मिरे जीने की आशा बिन तुम्हारे
दुआ के संग में कोई बद्दुआ है
मुहब्बत ख़ुदकुशी करने चली है
मिरे दिल में कोई गहरा कुआ है
किसी के इश्क़ में मारा गया हूँ
तिरे धोखे में ये धोखा हुआ है
मुझे पानी जो अब लाकर दिया है
किसी प्यासे के घर मातम हुआ है
तू जिससे रौशनी पाता है दिन में
किसी के घर का ये बुझता दिया है
मुझे आदत सी है अब तो तपन की
तभी सूरज पे मैंने घर लिया है
मुझे बरसों से कोई भूख सी है
कि मैंने ख़ुद को ही अब खा लिया है
सभी के जिस्म पीले पड़ गये हैं
लहू मेरा यहाँ जिस ने पिया है
मैं रुकता हूँ सदा शमशान जाकर
मिरे अंदर कोई मरकर जिया है
मैं ख़ुद ही दांव पे हूँ अपनी ख़ातिर
ये मेरी ज़िंदगी है या जुआ है
मिरे जीने की आशा बिन तुम्हारे
दुआ के संग में कोई बद्दुआ है
मुहब्बत ख़ुदकुशी करने चली है
मिरे दिल में कोई गहरा कुआ है
किसी के इश्क़ में मारा गया हूँ
तिरे धोखे में ये धोखा हुआ है
