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तीर-ए-मिज़्गाँ से मिरे क़ल्ब को बिस्मिल कर दो
चश्म-ए-बीमार के सदक़े मुझे शामिल कर दो
नाम तेरा ही पुकारूँ मैं शब-ओ-रोज़ यहाँ
अपनी उल्फ़त की तरफ़ रूह को माइल कर दो
कश्ती-ए-दिल को ज़रूरत है किसी रहबर की
अब्र-ए-रहमत से ज़रा मौज को साहिल कर दो
फ़िक्र-ए-दुनिया से छुड़ा कर मुझे ले जाओ कहीं
अपने अनवार के जलवों में ही ग़ाफ़िल कर दो
इश्क़-ए-ला-फ़ानी की सूरत बने ग़ौस अपनी भी
बंदगी की रह-ए-उल्फ़त को भी कामिल कर दो
तीर-ए-मिज़्गाँ से मिरे क़ल्ब को बिस्मिल कर दो
चश्म-ए-बीमार के सदक़े मुझे शामिल कर दो
नाम तेरा ही पुकारूँ मैं शब-ओ-रोज़ यहाँ
अपनी उल्फ़त की तरफ़ रूह को माइल कर दो
कश्ती-ए-दिल को ज़रूरत है किसी रहबर की
अब्र-ए-रहमत से ज़रा मौज को साहिल कर दो
फ़िक्र-ए-दुनिया से छुड़ा कर मुझे ले जाओ कहीं
अपने अनवार के जलवों में ही ग़ाफ़िल कर दो
इश्क़-ए-ला-फ़ानी की सूरत बने ग़ौस अपनी भी
बंदगी की रह-ए-उल्फ़त को भी कामिल कर दो













