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तीर-ए-मिज़्गाँ से मिरे क़ल्ब को बिस्मिल कर दो

चश्म-ए-बीमार के सदक़े मुझे शामिल कर दो


नाम तेरा ही पुकारूँ मैं शब-ओ-रोज़ यहाँ

अपनी उल्फ़त की तरफ़ रूह को माइल कर दो


कश्ती-ए-दिल को ज़रूरत है किसी रहबर की

अब्र-ए-रहमत से ज़रा मौज को साहिल कर दो


फ़िक्र-ए-दुनिया से छुड़ा कर मुझे ले जाओ कहीं

अपने अनवार के जलवों में ही ग़ाफ़िल कर दो


इश्क़-ए-ला-फ़ानी की सूरत बने ग़ौस अपनी भी

बंदगी की रह-ए-उल्फ़त को भी कामिल कर दो

-Adv. G. J. Farooqui Jagirdar @Gaus
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